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रविवार, 25 सितंबर 2011

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी - कव्वाली

... यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता [जान ए ग़ज़ल - असलम साबरी]

अपना दिल भी टटोलकर देखो फ़ासला बेवजह नहीं होता

[आभार यूट्यूब व क्लिप अपलोडर का]

3 टिप्‍पणियां:

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

बहुत आभार आपका !

दूरदर्शन पर यह कव्वाली देखा करते थे …
बहुत अच्छी कव्वाली है !



नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाओं सहित
-राजेन्द्र स्वर्णकार

नीरज गोस्वामी ने कहा…

SUPERB

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