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रविवार, 25 सितंबर 2011

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी - कव्वाली

... यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता [जान ए ग़ज़ल - असलम साबरी]

अपना दिल भी टटोलकर देखो फ़ासला बेवजह नहीं होता

[आभार यूट्यूब व क्लिप अपलोडर का]

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