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शनिवार, 17 सितंबर 2011

काका हाथरसी का जन्मदिन और पुण्यतिथि (18 सितम्बर)

काका हाथरसी की हास्य कविता
काका हाथरसी (पद्मश्री प्रभुलाल गर्ग)
जन्म: 18 सितंबर 1906 :: निधन: 18 सितंबर 1995
पद्मश्री काका हाथरसी का जन्म बरफ़ी देवी और शिवलाल गर्ग के यहाँ हाथरस में हुआ था। जब वे मात्र 14 दिन के थे प्लेग की महामारी ने उनके पिता को छीन लिया और परिवार के दुर्दिन आरम्भ हो गये। भयंकर गरीबी में भी काका ने अपना संघर्ष जारी रखते हुए छोटी-मोटी नौकरियों के साथ ही कविता रचना और संगीत शिक्षा का समंवय बनाये रखा। उन्होने हास्य कविताओं के साथ-साथ संगीत पर पुस्तकें भी लिखीं और संगीत पर एक मासिक पत्रिका का सम्पादन भी किया। काका के कारतूस और काका की फुलझडियाँ जैसे स्तम्भों के द्वारा अपने पाठकों के प्रश्नों के उत्तर देते हुए वे अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों के प्रति भी सचेत रहते थे। उनकी प्रथम प्रकाशित रचना 1933 में "गुलदस्ता" मासिक पत्रिका में उनके वास्तविक नाम से छपी थी।

शिव का धनुष (हास्य कविता: काका हाथरसी)

विद्यालय में आ गए इंस्पेक्टर इस्कूल
छठी क्लास में पढ़ रहा विद्यार्थी हरफूल
विद्यार्थी हरफूल, प्रश्न उससे कर बैठे
किसने तोड़ा शिव का धनुष बताओ बेटे
छात्र सिटपिटा गया बेचारा, धीरज छोड़ा
हाथ जोड़कर बोला, सर, मैंने न तोड़ा

उत्तर सुनकर आ गया, सर के सर को ताव
फौरन बुलवाए गए हेड्डमास्टर सा'ब
हेड्डमास्टर सा'ब, पढ़ाते हो क्या इनको
किसने तोड़ा धनुष नहीं मालूम है जिनको
हेडमास्टर भन्नाया, फिर तोड़ा किसने
झूठ बोलता है, ज़रूर तोड़ा है इसने

इंस्पेक्टर अब क्या कहे, मन ही मन मुस्कात
ऑफिस में आकर हुई, मैनेजर से बात
मैनेजर से बात, छात्र में जितनी भी है
उससे दुगुनी बुद्धि हेडमास्टर जी की है
मैनेजर बोला, जी हम चन्दा कर लेंगे
नया धनुष उससे भी अच्छा बनवा देंगे

शिक्षा-मंत्री तक गए जब उनके जज़्बात
माननीय गदगद हुए, बहुत खुशी की बात
बहुत खुशी की बात, धन्य हैं ऐसे बच्चे
अध्यापक, मैनेजर भी हैं कितने सच्चे
कह दो उनसे, चन्दा कुछ ज़्यादा कर लेना
जो बैलेन्स बचे वह हमको भिजवा देना
--<>--
[विडियो अल्ट्राहिन्दी से साभार :: Video Courtesy UltraHindi]
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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* प्यार किया तो मरना क्या (ऑडिओ)
* काका हाथरसी के जन्मदिन व पुण्यतिथि पर विशेष
* काका हाथरसी की हास्य कविता

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

हमसे मत उलझो तुम इस क्षण - रथवान

प्राख्यात कवि पण्डित नरेन्द्र शर्मा की तेजस्वी रचना श्रीमती लावण्या शाह के मधुर स्वर में पढिये, सुनिये या डाउनलोड कीजिये पिट ऑडिओ पर

श्रीमती लावण्या शाह
हम हरि के धन के रथ-वाहक,
तुम तस्कर, पर-धन के गाहक।
हम हैं, परमारथ-पथ-गामी
तुम रत स्वारथ में।
हमें तुम, रोको मत पथ में।

अनधिकार कर जतन थके तुम,
छाया भी पर छू न सके तुम!
सदा-स्वरूपा एक सदृश वह
पथ के इति-अथ में।
हमें तुम, रोको मत पथ में।



अनाचार का प्रखर विरोध सतत करते हुए भी शिष्टता कैसे बनाये रखी जा सकती है, इसका अनन्य उदाहरण है उपरोक्त रचना।

[ब्लॉग पर जाकर सम्पूर्ण रचना पढने, सुनने व डाउनलोड करने के लिये यहाँ क्लिक करें]

पुरातन पोस्ट पत्रावली

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

Featured Hindi Blog Post - छंद-चर्चा

प्रतुल वशिष्ठ
श्री प्रतुल वशिष्ठ की यह ज्ञानवर्धक पोस्ट उनके ब्लॉग दर्शन प्राशन पर पढी जा सकती है।

किसी रचना के प्रत्येक पाद में मात्राओं अथवा वर्णों की नियत संख्या, क्रम-योजना एवं यति के विशेष विधान पर आधारित नियम को छंद कहते हैं ...
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